Friday,28 January 2022   12:01 pm
Tulsi Vivah 2021: तुलसी विवाह का शुभ मुहूर्त एवं पूजन विधि। तुलसी विवाह का महत्व।

Tulsi Vivah 2021: तुलसी विवाह का शुभ मुहूर्त एवं पूजन विधि। तुलसी विवाह का महत्व।

15-Nov-2021

इस बार देव प्रबोधिनी एकादशी और तुलसी विवाह पर्व कहीं 14 तो कुछ जगहों पर 15 नवंबर को मनाया जा रहा है। यानी दोनों दिन एकादशी तिथि रहेगी। ऐसा पंचांगों में तिथियों की गणना में भेद होने की वजह हो रहा है। ये तिथि खास इसलिए है क्योंकि पद्म और विष्णुधर्मोत्तर पुराण के मुताबिक इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं। इसी के साथ तप और नियम-संयम से रहने का चातुर्मास भी खत्म होता है। इस दिन से ही शादियां और गृह-प्रवेश जैसे मांगलिक कामों की शुरुआत हो जाती है। इस दिन शाम को भगवान विष्णु का शालग्राम के रूप में तुलसी के साथ विवाह करवाने की भी परंपरा है।

भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी को चार माह के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं और देवउठनी एकादशी के दिन जागते हैं। इसके बाद भगवान विष्णु सबसे पहले तुलसी से विवाह करते हैं। इसलिए हर साल कार्तिक मास की द्वादशी को महिलाएं तुलसी और शालिग्राम का विवाह करवाती हैं।

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवउठनी एकादशी कहा जाता है। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी को चार माह के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं और देवउठनी एकादशी के दिन जागते हैं। इसके बाद भगवान विष्णु सबसे पहले तुलसी से विवाह करते हैं। इसलिए हर साल कार्तिक मास की द्वादशी को महिलाएं तुलसी और शालिग्राम का विवाह करवाती हैं। इस बार तुलसी-शालिग्राम विवाह सोमवार, 15 नवंबर को कराया जा रहा है। आइए अब आपको इसके पीछे का इतिहास और मान्यताओं के बारे में बताते हैं।

 विष्णु ने किया था तुलसी से विवाह?

शंखचूड़ नामक दैत्य की पत्नी वृंदा अत्यंत सती थी। बिना उसके सतीत्व को भंग किए शंखचूड़ को परास्त कर पाना असंभव था। श्री हरि ने छल से रूप बदलकर वृंदा का सतीत्व भंग कर दिया और तब जाकर शिव ने शंखचूड़ का वध किया। वृंदा ने इस छल के लिए श्री हरि को शिला रूप में परिवर्तित हो जाने का शाप दिया। श्री हरि तबसे शिला रूप में भी रहते हैं और उन्हें शालिग्राम कहा जाता है।

वृंदा ने अगले जन्म में तुलसी के रूप में जन्म लिया था। श्री हरि ने वृंदा को आशीर्वाद दिया था कि बिना तुलसी दल के कभी उनकी पूजा सम्पूर्ण ही नहीं होगी। जिस प्रकार भगवान शिव के विग्रह के रूप में शिवलिंग की पूजा की जाती है। उसी प्रकार भगवान विष्णु के विग्रह के रूप में शालिग्राम की पूजा की जाती है। शालिग्राम एक गोल काले रंग का पत्थर है जो नेपाल के गण्डकी नदी के तल में पाया जाता है। इसमें एक छिद्र होता है और पत्थर के अंदर शंख, चक्र, गदा या पद्म खुदे होते हैं।

 

देवोत्थान एकादशी व्रत और पूजा विधि

प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु का पूजन और उनसे जागने का आह्वान किया जाता है।

प्रातःकाल उठकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए और भगवान विष्णु का ध्यान करना चाहिए। घर की सफाई के बाद स्नान आदि से निवृत्त होकर आंगन में भगवान विष्णु के चरणों की आकृति बनाना चाहिए। एक ओखली में गेरू से चित्र बनाकर फल, मिठाई, बेर, सिंघाड़े, ऋतुफल और गन्ना उस स्थान पर रखकर उसे डलिया से ढांक देना चाहिए।

इस दिन रात्रि में घरों के बाहर और पूजा स्थल पर दीये जलाना चाहिए। रात्रि के समय परिवार के सभी सदस्य को भगवान विष्णु समेत सभी देवी-देवताओं का पूजन करना चाहिए। इसके बाद भगवान को शंख, घंटा-घड़ियाल आदि बजाकर उठाना चाहिए।

 

तुलसी विवाह का आयोजन

देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह का आयोजन भी किया जाता है। तुलसी के वृक्ष और शालिग्राम की यह शादी सामान्य विवाह की तरह पूरे धूमधाम से की जाती है। चूंकि तुलसी को विष्णु प्रिया भी कहते हैं इसलिए देवता जब जागते हैं, तो सबसे पहली प्रार्थना हरिवल्लभा तुलसी की ही सुनते हैं।

तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आह्वान करना। शास्त्रों में कहा गया है कि जिन दंपत्तियों के कन्या नहीं होती, वे जीवन में एक बार तुलसी का विवाह करके कन्यादान का पुण्य अवश्य प्राप्त करें।


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