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इन 4 आदतों के कारण मनुष्य का जीवन बहुत जल्दी हो जाता है नष्ट, जानिए क्यों होता है ऐसा

08-Jul-2021

महाभारत के अनुसार महात्मा विदुर महाराज धृतराष्ट्र के भाई थे। इनकी नीतियां आज के समय में भी काफी प्रासंगिक प्रतीत होती हैं। इन्होंने अपनी नीतियों में मानव समाज के कल्याण से संबंधित कई जरूरी बातें बताई हैं। यहां हम जानेंगे विदुर जी की उस नीति के बारे में जिसमें इन्होंने बताया है कि मनुष्य की कौन सी आदतें उसे पतन की ओर ले जाती हैं।

लालच और स्वार्थ: आपने वो कहावत तो सुनी ही होगी लालच बुरी बला है। इससे इंसान खुद का ही नुकसान कर लेता है। विदुर नीति के अनुसार भी लालच इंसान का सबसे बड़ा शत्रु माना गया है। जो व्यक्ति लालच करता है, उसका जीवन बहुत जल्दी नष्ट हो जाता है। लालची व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता। विदुर नीति लालच इंसान की आयु कम होने का कारण बनता है।

क्रोध: विदुर नीति अनुसार मनुष्य को अधिक क्रोध करने से बचना चाहिए क्योंकि क्रोध आने पर मनुष्य को सही और गलत का भान नहीं रहता है। ऐसे में मनुष्य कोई न कोई गलती करके अपना ही नुकसान कर लेता है। इसलिए कहा गया है कि अत्यधिक क्रोध करने वालों का जीवन कम समय का होता है।

त्याग: जीवन में सुख और शांति बने रहे इसके लिए व्यक्ति के अंदर त्याग का गुण होना चाहिए। जिस इंसान के अंदर त्याग की भावना नहीं होती है ऐसे लोगों का जीवन लघु माना जाता है। स्वार्थी इंसान के अंदर त्याग भावना बिल्कुल भी नहीं होती वो हर चीज में सिर्फ अपनी ही खुशी देखता है। जिस कारण ऐसे लोगों को दुख के समय में किसी का साथ नहीं मिल पाता। विदुर नीति अनुसार त्याग का गुण न होने पर व्यक्ति का जीवनकाल लघु माना जाता है।

अहंकार: व्यक्ति को अहंकार की भावना से दूर रहना चाहिए। अहंकारी व्यक्ति को भी सही और गलत की समझ नहीं होती जिस कारण वो खुद का ही नुकसान कर बैठता है। अहंकार किसी भी इंसान की बुद्धि भ्रष्ट कर देता है। विदुर नीति अनुसार ऐसे लोगों का जीवन भी लघु माना जाता है।

कोरोनाकाल में व्रत और रोज़ा रख रही हैं तो , रखना होगा खास ख्याल

15-Apr-2021

नई दिल्ली,इंडिया। ये साल 2021 है। अप्रैल का महीना चल रहा है। तमाम धर्मावलंबी नवरात्र और रमज़ान मना रहे हैं।  व्रत के दौरान इम्यूनिटी को बरकरार रखना बहुत आवश्यक है।  ऐसा देखा गया है कि प्राय: व्रत की अवस्था में व्रती अपनी इम्युनिटी पर ध्यान नहीं देते हैं, जबकि कोरोनाकाल में हमें उपवास के साथ-साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी ध्यान चाहिए। कोरोना के समय व्रत और रोज़ा रखने में क्या सावधानियां बरती जाएं? भारत जैसे देश में, जहां बड़ी संख्या में महिलाएं खून की कमी, डायबटीज और कुपोषण से जूझ रही हैं, उनके लिए कोरोना के दौरान व्रत और रोज़ा रखने के क्या मायने हैं? इन सभी सवालों के जवाब विस्तार से जानते हैं।

देश में कोरोना वायरस संक्रमण की दूसरी लहर तबाही मचा रही है। कब्रिस्तानों में जगह नहीं मिल रही है। सरकारी तंत्र ने भी लगभग अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। तबाही का मंजर ऐसा है कि शवों को जलाते-जलाते श्मशानों की भठ्ठियां पिघल गई हैं।  ऐसे में लोगों से कहा जा रहा है और उन्होंने खुद भी यह समझ लिया है कि कोरोना से अगर बचना है, तो उन्हें खुद ही सावधानी बरतनी होगी। क्योंकि गंभीर रूप से बीमार पड़ने पर ढंग का इलाज मिलने की संभावना बहुत कम है।

इम्युनिटी को बेहतर बनाने के लिए फलों का सेवन बेहद जरूरी है। कोरोना की बात करें तो विटामिन सी युक्त फलों को सबसे बेहतर बताया गया है। किवी (Kiwi) विदेशी फल होने की वजह से महंगा होता है, लेकिन यह विटामिन सी के साथ ही विटामिन के, विटामिन ई, फोलेट, पोटेशियम आदि का अच्छा स्रोत है। किवी में अधिक मात्रा में एंटी ऑक्सीडेंट होता है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बढ़ाता है। वहीं अनानास, पपीता, अमरूद जैसे फल खाकर भी इम्यून सिस्टम मजबूत बनाया जा सकता है। हालांकि अति हर चीज की बुरी है। ऐसे में किवी समेत किसी भी फल को तय मात्रा के अनुरूप ही लें।

व्रत के दौरान लोग आलू का सेवन ज्यादा कर लेते हैं। इससे शरीर को नुकसान पहुंचता है। अगर आलू खाने हैं तो भी दही के साथ खाएं। व्रत के दौरान ध्यान रखें कि शरीर में पानी की कमी न हो। ऐसे में थोड़े थोड़े समय बाद पानी पीते रहें। व्रत के दौरान आप नारियल पानी का सेवन करते हैं तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। दूछ और छाछ भी शरीर के लिए बेहतर रहती है। शाम को खाने में कुट्टू के आटा की देसी घी में बनी पुरी का सेवन कर आप शरीर की इम्युनिटी को बनाए रख सकते हैं। व्रत के दौरान खुद को लंबे समय तक भूखा न रखें, थोड़े-थोड़े समय पर हल्की चीजों का सेवन करते रहें।

ड्राइ फ्रूट्स का सेवन भी बेहतर : आप ड्राइ फ्रूट्स का सेवन करके भी शरीर की इम्युनिटी को बनाए रख सकते हैं। रात के भिगोए अखरोट खाने से काफी फायदा होता है। एक रिपोर्ट में बच्चों को रोजाना दो और बड़ों को रोजाना पांच बादाम खाने की सलाह दी गई है। बादाम को एक रात पहले पानी में भिगोकर रखना चाहिए और बाद में छिलका उतारकर इनका सेवन कर लें। बादाम में विटमिन-ई, कॉपर, जिंक और आयरन होता है, जो कि हमारी इम्युनिटी को बढ़ाते हैं। हालांकि दोबारा बता दें कि तय मात्रा से अधिक किसी चीज का सेवन न करें, क्योंकि ऐसा करना आपके स्वास्थ्य पर विपरीत असर भी डाल सकता है।

नव संवत्सर 2078: आज से शुरू हो रहे नवसंवत्सर 2078 का प्रभाव और भविष्यवाणी

13-Apr-2021

इस बार 13 अप्रैल 2021 से नव संवत्सर 2078 की शुरूआत हो रही है। यह हिंदुओं का नववर्ष है। इसकी शुरूआत हिंदू धर्म के पंचाग के अनुसार चैत्र प्रतिपदा के पहले दिन से होती है। वहीं इसी दिन से चैत्र नवरात्रि 2021 का भी शुभारंभ होगा।

जानकारों के अनुसार हिंदू वर्ष 2077 प्रमादी नाम से जाना गया, ऐसे में इसके बाद इस बार 13 अप्रैल मंगलवार को आनंद संवत्सर का आरंभ होना चाहिए था, लेकिन 2077 का प्रमादी संवत्सर अपूर्ण रहने से यानि केवल फाल्गुन मास तक रहा।

हिंदू ग्रंथों के अनुसार, पुराणों में कुल 60 संवत्सरों का जिक्र है. इसके मुताबिक़ नवसंवत्सर यानी नवसंवत्सर 2078 का नाम आनंद होना चाहिए था. लेकिन ग्रहों के कुछ ऐसे योग बन रहे हैं जिसकी वजह से इस हिन्दू नववर्ष का नाम 'राक्षस' है. हिंदू नव वर्ष यानी कि नव संवत्सर की शुरुआत राजा विक्रमादित्य ने की थी, इसलिए इसे विक्रम संवत कहा जाता है. यह अंग्रेजी कैलेंडर से 57 साल आगे है. अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह वर्ष 2021 तो वहीं हिंदू पंचांग के अनुसार, यह नया साल यानी कि नवसंवत्सर 2078 है.

जबकि इसके बाद पड़ने वाला 'आनन्द' नाम का विलुप्त संवत्सर पूर्ण वत्सरी अमावस्या तक रहेगा। ऐसे में आगामी संवत्सर संवत 2078 जो राक्षस ( Rakshas Samvatsar ) नाम का होगा, वह चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होगा। यह संवत्सर 31 गते चैत्र तद अनुसार 13 अप्रैल 2021 मंगलवार से प्रारंभ होगा।

 इसके अलावा संवत्सर 2078 ( NavSamvatsar ) में बहुत ज्यादा गर्मी पड़ने व कम बरसात होने के संकेत हैं। वहीं इस साल की मंगल की केबिनेट में बृहस्पति यानि गुरु के पास वित्त विभाग रहेगा। व्यापार, व्यावसाय में प्रगति व आर्थिक वृद्धि होने से लोगों की जीवन शैली में सुधार होगा।

महाशिवरात्रि पर हरिद्वार में उमड़े श्रद्धालु, अभी तक 22 लाख लोगों ने किया स्नान

11-Mar-2021

हरिद्वार,इंडिया आज महाशिवरात्रि के मौके पर महाकुंभ का पहला शाही स्नान है। हरिद्वार में हरकी पौड़ी पर शाही स्नान के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा है। आईजी कुंभ संजय गुंज्याल का दावा है कि बुधवार रात 12 बजे से अब तक 22 लाख से ज्यादा लोगों ने स्नान किया है।

संतों के स्नान से पहले सुबह करीब सात बजे हरकी पैड़ी घाट खाली करवा दिया गया। सुबह 11 बजे से अखाड़ों के संत स्नान करेंगे। हालांकि तभी से शाही स्नान की शुरुआत मानी जाएगी। श्रद्धालु हरकी पैड़ी क्षेत्र छोड़कर अन्य घाटों पर स्नान करेंगे।

महाशिवरात्रि पर्व और महाकुंभ के पहले शाही स्नान पर हरिद्वार में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ा है। देर रात से हाईवे जाम हैं और श्रद्धालु पैदल गंगा घाटों पर पहुंच रहे हैं। सुबह तड़के से ही हरकी पैड़ी पर जबरदस्त भीड़ लगी है।

श्रद्धालुओं ने हरकी पैड़ी पर डुबकी लगाकर भगवान शंकर का जलाभिषेक किया। सुबह 11:00 बजे से हरकी पैड़ी पर ब्रह्मकुंड में संतों का शाही होगा। संतों के स्नान शुरू होने पर हरकी पैड़ी के घाटों पर श्रद्धालुओं का प्रवेश बंद कर दिया गया।

दशनामी संन्यासी अखाड़ों के स्नान से पहले ही हरकी पैड़ी ब्रह्मकुंड पर स्नान करने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ गई। पुलिस को हरकी पैड़ी से लेकर हाईवे तक भीड़ से जूझना पड़ रहा है। सुबह 11:00 बजे से लेकर शाम 6:30 बजे तक दसनामी सन्यासी अखाड़ों के साधु संत महामंडलेश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्नान करेंगे।

आज है तुलसी विवाह और देवउठनी एकादशी व्रत, जानें पूजा का समय और विधि

25-Nov-2020

आज तुलसी विवाह और देवउठनी एकादशी है। कहते हैं कि कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को श्रीहरि चतुर्मास की निद्रा से जागते हैं, इसीलिए इस एकादशी को देवउठनी एकादशी भी कहते हैं। इस दिन से ही हिन्दू धर्म में शुभ कार्य जैसे विवाह आदि शुरू हो जाते हैं। देवउठनी एकादशी के दिन ही भगवान विष्णु के स्वरूप शालीग्राम का देवी तुलसी से विवाह होने की परंपरा भी है। माना जाता है कि जो भक्त देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह का अनुष्ठान करता है उसे कन्यादान के बराबर पुण्य मिलता है। वहीं एकादशी व्रत को लेकर मान्यता है कि साल के सभी 24 एकादशी व्रत करने पर लोगों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता तुलसी ने भगवान विष्णु को नाराज होकर श्राम दे दिया था कि तुम काला पत्थर बन जाओगे। इसी श्राप की मुक्ति के लिए भगवान ने शालीग्राम पत्थर के रूप में अवतार लिया और तुलसी से विवाह कर लिया। वहीं तुलसी को माता लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। हालांकि कई लोग तुलसी विवाह एकादशी को करते है तो कहीं द्वादशी के दिन तुलसी विवाह होता है। ऐसे में एकादशी और द्वादशी दोनों तिथियों का समय तुलसी विवाह के लिए तय किया गया है।

तुलसी विवाह की पूजा विधि :

एक चौकी पर तुलसी का पौधा और दूसरी चौकी पर शालिग्राम को स्थापित करें। इनके बगल में एक जल भरा कलश रखें और उसके ऊपर आम के पांच पत्ते रखें। तुलसी के गमले में गेरू लगाएं और घी का दीपक जलाएं। तुलसी और शालिग्राम पर गंगाजल का छिड़काव करें और रोली, चंदन का टीका लगाएं। तुलसी के गमले में ही गन्ने से मंडप बनाएं। अब तुलसी को सुहाग का प्रतीक लाल चुनरी ओढ़ा दें। गमले को साड़ी लपेट कर, चूड़ी चढ़ाएं और उनका दुल्हन की तरह श्रृंगार करें। इसके बाद शालिग्राम को चौकी समेत हाथ में लेकर तुलसी की सात बार परिक्रमा की जाती है। इसके बाद आरती करें। तुलसी विवाह संपन्न होने के बाद सभी लोगों को प्रसाद बांटे।

  • एकादशी तिथि और तुलसी विवाह का समय-एकादशी तिथि प्रारंभ- 25 नवंबर 2020, बुधवार को सुबह 2।42 बजे से

  • एकादशी तिथि समाप्त- 26 नवंबर 2020, गुरुवार को सुबह 5।10 बजे तक

  • द्वादशी तिथि प्रारंभ- 26 नवंबर 2020, गुरुवार को सुबह 5।10 बजे से

  • द्वादशी तिथि समाप्त- 27 नवंबर 2020, शुक्रवार को सुबह 7।46 बजे तक

  • एकादशी व्रत और पूजा विधि-

  • -एकादशी व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि करें और व्रत का संकल्प लें।

  • -इसके बाद भगवान विष्णु की अराधना करें।

  • -भगवान विष्णु के सामने दीप-धूप जलाएं। फिर उन्हें फल, फूल और भोग अर्पित करें।

  • -मान्यता है कि एकादशी के दिन भगवान विष्णु को तुलसी जरूर अर्पित करनी चाहिए।

  • -शाम को विष्णु जी की अराधना करते हुए विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करें।

  • -एकादशी के दिन पूर्व संध्या को व्रती को सिर्फ सात्विक भोजन करना चाहिए।

  • -एकादशी के दिन व्रत के दौरान अन्न का सेवन नहीं किया जाता है।

  • -एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित है।

  • -एकादशी का व्रत खोलने के बाद ब्राहम्णों को दान-दक्षिणा जरूर दें।

छठ पूजा: आज डूबते सूर्य को अर्घ्य देंगे व्रती, छठ पूजा का शुभ मुहूर्त

20-Nov-2020

सूर्य की आस्था का महापर्व छठ पूजा का प्रारंभ बुधवार से हो चुका है। आज खरना है।नहाय-खाय से व्रती अपने व्रत का आगाज करते हैं। छठ पूजा बिहार समेत देश के कई बड़े शहरों में मनाया जाता है। यह व्रत सभी व्रतों में सबसे कठिन माना जाता है क्यों​कि यह व्रत 36 घंटे तक निर्जला रखना होता है। छठ पूजा के व्रत का नियम भी सभी व्रतों से अलग होता है। आप यदि छठ पूजा का व्रत रखते हैं, तो आपको इसके नियमों की जानकारी होनी चाहिए। नियमपूर्वक व्रत न करने से छठी मैया और सूर्य देव का आशीष प्राप्त नहीं होता है और व्रत भी निष्फल हो जाता है। छठ पूजा का व्रत संतान प्राप्ति, उसकी सुरक्षा तथा सफल जीवन के लिए किया जाता है। कहा जाता है कि राजा सगर ने सूर्य षष्ठी का व्रत सही से नहीं किया था, जिसके प्रभाव से ही उनके 60 हजार पुत्र मृत्यु को प्राप्त हुए।

छठ पूजा का शुभ मुहूर्त (Chhath Puja Ka Shubh Muhurat)

20 नवंबर 2020, अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य

सूर्यास्त टाइम - 5:26 pm (दिल्ली में)

सूर्यास्त टाइम - 4:59 pm (पटना में)

21 नवंबर 2020, उगते सूर्य को अर्घ्य

सूर्योदय टाइम- 6:49 am (दिल्ली में)

सूर्योदय टाइम- 6:11 am (पटना में)

छठ पूजा व्रत के नियम

1. 4 दिनों की छठ पूजा का व्रत रखने वाले व्यक्ति को पलंग या तखत पर सोने की मनाही होती है। वह जमीन पर चटाई बिछाकर सो सकता है तथा कंबल आदि का प्रयोग कर सकता है।

2. व्रती को चारों दिन नए और साफ वस्त्र पहनना होता है। इसमें भी इस बात का ध्यान दिया जाता है कि वे वस्त्र सिले न हों। महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनते हैं। हालांकि आजकल लोग कोई भी वस्त्र पहन लेते हैं।

3. व्रत रखने वाले शख्स को मांस, मदिरा, झूठी बातें, काम, क्रोध, लोभ, धूम्रपान आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

4. आप छठ पूजा का व्रत रखते हैं तो परिवार के सभी सदस्य को तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए। इन चार दिनों में सात्विक भोजन ही करें।

5. छठ पूजा के व्रत में बांस के सूप का प्रयोग होता है। सूर्य देव की जब संध्या त​था प्रात:काल की पूजा होती है, तो उस समय सूप में ही पूजन सामग्री रखकर उनको अर्पित किया जाता है।

6. छठ पूजा में छठी मैया तथा भगवान भास्कर को ठेकुआ तथा कसार (चावल के आटे के लड्डू) का भोग लगाना चाहिए।

7. छठी मैया की पूजा का व्रत साफ-सफाई का है। पहले दिन घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई की जाती है। घाटों की भी सफाई की जाती है।

8. छठ पूजा में सूर्य देव को अर्घ्य देने के लिए गन्ने का प्रयोग अवश्य करें। इसमें पत्ते वाले गन्ने का उपयोग किया जाता है।

आज है भैया दूज, जानिए भाई को टीका लगाने का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और मान्यताएं

16-Nov-2020

स्नेह, सौहार्द का प्रतीक भैया दूज दीपोत्सव के अंतिम दिन यानी सोमवार को कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा उपरांत द्वितीया को अनुराधा नक्षत्र में मनाया जाएगा। बहनें व्रत, पूजा, कथा आदि कर भाई की लंबी उम्र की कामना करेंगी। उनके माथे पर तिलक लगाएंगी। इसके बदले भाई भी उनकी रक्षा का संकल्प लेते हुए उपहार देते हैं। यह त्योहार रक्षाबंधन की तरह ही महत्व रखता है। सोमवार की सुबह 8 :52 बजे तक राहुकाल रहेगा तथा द्वितीया तिथि की शुरुआत 09:11 बजे से हो रही है, इसीलिए बहनें इसके बाद पूजा या भाई को टीका लगाएंगी।

भाई की सलामती को रखेंगी व्रत-:
भारतीय ज्योतिष विज्ञान परिषद के सदस्य ज्योतिषाचार्य पंडित राकेश झा शास्त्री ने बताया कि सोमवार को जहां बहनें अपने भाई के लिए भाई दूज का पर्व मनाएंगी, वहीं कायस्थ समुदाय के लोग भगवान चित्रगुप्त की पूजा विधि विधान से मनाएंगे।
इस दिन यमुना नदी में स्नान कर श्रद्धालु यम का तर्पण एवं गोवर्धन देव की पूजन करेंगे। पंडित झा ने स्कन्द पुराण का हवाला देते हुए कहा कि इस दिन भाई को बहन के घर भोजन करना और उन्हेंं उपहार देने अत्यंत शुभ माना गया है। ऐसा करने से यम के दुष्प्रभाव भी कम हो जाता है।

चौमुखी दीपक से दूर होंगे यमराज-:
पंडित झा ने कहा कि बहन सायंकाल गोधूलि बेला में यमराज के नाम से चौमुखी दीया जलाकर घर के बाहर रखती है जिसका मुख दक्षिण दिशा की ओर होता है। इससे मान्यता है कि भाई के प्राण की रक्षा होती है। भाई का चतुॢदक विकास होता है। दैहिक, दैविक और भौतिक संतापों से भाई की सुरक्षा होती है। दीपक प्रकाश देते हुए सभी प्रकार के तम को दूर करता है। इस प्रकार यह पर्व बहुत ही श्रद्धा पूर्वक मनाया जाता है। भाई बहन का यह पर्व दीपों के पर्व का उपसंहार है।

भाई दूज पूजन का शुभ मुहूर्त-:

अभिजीत मुहूर्त : दोपहर 11:13 से 11:56 बजे तक
गुली काल मुहूर्त : दोपहर 12:56 से 02:17 बजे तक
शुभ मुहूर्त: मध्य काल 12:56 से शाम 03:06 बजे तक

आज है गोवर्धन पूजा, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि और अन्नकूट का महत्व

15-Nov-2020

Govardhan Puja या Annakoot Utsav, दिवाली के अगले दिन मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाए जाने की परंपरा रही है। गोवर्धन पूजा यानी अन्नकूट को दिवाली के अगले दिन मनाते हैं। गोवर्धन पर्वत या गिरिराज पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी कनिष्ठ उंगली से ऊपर उठाकर भारी बारिश से बृजवासियों के प्राणों की रक्षा की थी। तभी से गोवर्धन पूजा शुरू की जाने लगी। भगवान श्री कृष्ण ने ही गोवर्धन पूजा करने के लिए कहा था। गोवर्धन पूजा दिवाली के अगले दिन सुबह जल्दी की जाती है।

गोवर्द्धन पूजा की तिथि और शुभ मुहूर्त : गोवर्द्धन पूजा / अन्नकूट की तिथि: 15 नवंबर 2020 प्रतिपदा तिथि प्रारंभ: 15 नवंबर 2020 को सुबह 10 बजकर 36 मिनट से प्रतिपदा तिथि समाप्त: 16 नवंबर 2020 को सुबह 07 बजकर 06 मिनट तक गोवर्द्धन पूजा सांयकाल मुहूर्त: 15 नवंबर 2020 को दोपहर 03 बजकर 19 मिनट से शाम 05 बजकर 27 मिनट तक कुल अवधि: 02 घंटे 09 मिनट

अन्नकूट क्या है : अन्नकूट पर भगवान कृष्ण को अलग तरह के पकवान चढ़ाए जाते हैं, इस दिन कृष्ण को भोग लगाए जाते हैं। मान्यताओं के मुताबिक भगवान श्रीकृष्ण के अवतार के बाद द्वापर युग से अन्नकूट और गोवर्धन पूजा की शुरुआत हुई। एक और मान्यता है कि एक बार इंद्र अभिमान में चूर हो गए और सात दिन तक लगातार बारिश करने लगे। तब भगवान श्री कृष्ण ने उनके अहंकार को तोड़ने और जनता की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को ही अंगुली पर उठा लिया था और तभी से गोवर्धन की पूजा होती है।

गोवर्धन पूजा की कहानी : भगवान श्री कृष्ण ने बृजवासियों को इंद्र की पूजा करते हुए देखा तो उनके मन में इसके बारे में जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। श्री कृष्ण की मां भी इंद्र की पूजा कर रही थीं। कृष्ण ने इसका कारण पूछा तब बताया गया कि इंद्र बारिश करते हैं, तब खेतों में अन्न होता है और हमारी गायों को चारा मिलता है। इस पर श्री कृष्ण ने कहा कि हमारी गायें तो गोवर्धन पर्वत पर ही रहती हैं इसलिए गोवर्धन पर्वत की पूजा की जानी चाहिए। इस पर बृजवासियों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा शुरू कर दी तब इंद्र को क्रोध आया और उन्होंने मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। चारों तरफ पानी के कारण बृजवासियों की जान बचाने के लिए श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठ उंगली पर उठा लिया। लोगों ने उसके नीचे शरण लेकर अपनी जान बचाई। इंद्र को जब पता चला कि कृष्ण ही विष्णु अवतार हैं, तब उन्होंने उनसे माफी मांगी। इसके बाद श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पूजा के लिए कहा और इसे अन्नकुट पर्व के रूप में मनाया जाने लगा।भगवान श्री कृष्ण ने बृजवासियों को इंद्र की पूजा करते हुए देखा तो उनके मन में इसके बारे में जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। श्री कृष्ण की मां भी इंद्र की पूजा कर रही थीं। कृष्ण ने इसका कारण पूछा तब बताया गया कि इंद्र बारिश करते हैं, तब खेतों में अन्न होता है और हमारी गायों को चारा मिलता है। इस पर श्री कृष्ण ने कहा कि हमारी गायें तो गोवर्धन पर्वत पर ही रहती हैं इसलिए गोवर्धन पर्वत की पूजा की जानी चाहिए। इस पर बृजवासियों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा शुरू कर दी तब इंद्र को क्रोध आया और उन्होंने मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। चारों तरफ पानी के कारण बृजवासियों की जान बचाने के लिए श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठ उंगली पर उठा लिया। लोगों ने उसके नीचे शरण लेकर अपनी जान बचाई। इंद्र को जब पता चला कि कृष्ण ही विष्णु अवतार हैं, तब उन्होंने उनसे माफी मांगी। इसके बाद श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पूजा के लिए कहा और इसे अन्नकुट पर्व के रूप में मनाया जाने लगा।

इस दिवाली दिखेगा ग्रहों का अद्भुत खेल, जानें शुभ मुहूर्त, लक्ष्मी पूजन का सही तरीका और आरती

13-Nov-2020

Diwali हिन्दुओं के सबसे प्रमुख और बड़े त्योहारों में से एक है। यह खुशहाली, समृद्धि, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का द्योतक है। रोशनी का यह त्योहार बताता है कि चाहे कुछ भी हो जाए असत्य पर सत्य की जीत अवश्

य होती है। मान्यता है कि रावण की लंका का दहन कर 14 वर्ष का वनवास काटकर भगवान राम अपने घर लौटे थे। इसी खुशी में पूरी प्रजा ने नगर में अपने राम का स्वागत घी के दीपक जलाकर किया। राम के भक्तों ने पूरी अयोध्या को दीयों की रोशनी से भर दिया था। दीवाली के दिन को मां लक्ष्मी (Maa Lakshmi) के जन्म दिवस के तौर पर मनाया जाता है। वहीं, यह भी माना जाता है कि दीवाली की रात को ही मां लक्ष्मी में भगवान विष्णु से शादी की थी। इस दिन श्री गणेश, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती की पूजा (Diwali Puja) का विधान है। मान्यता है कि विधि-विधान से पूजा करने पर दरिद्रता दूर होती है और सुख-समृद्धि तथा बुद्धि का आगमन होता है। हिन्दुओं के अलावा सिख, बौद्ध और जैन धर्म के लोग भी दीवाली धूमधाम से मनाते हैं।

दीपावली का शुभ मुहूर्त : 14 नवंबर को चतुर्दशी तिथि पड़ रही है जो दोपहर 1:16 तक रहेगी। इसके बाद अमावस तिथि का आरंभ हो जाएगा जो 15 नवम्बर की सुबह 10 बजे तक रहेगी। 15 तारीख को केवल स्नान दान की अमावस्या ही रह जाएगी।

दिवाली पर पूजा विधि :आचार्य डॉ. शिव बहादुर तिवारी ने बताया कि दीपावली पर विधिवत पूजा विशेष फल देने वाली है। सबसे पहले ऊँ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: वाह्याभंतर: शुचि:।। मंत्र का उच्चारण करते हुए जल अपने आसन और अपने आप पर भी छिड़के। कलश पर एक नारियल रखें। नारियल लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि उसका अग्रभाग दिखाई देता रहे। यह कलश वरुण का प्रतीक है। सबसे पहले गणेश जी की पूजा करें, फिर लक्ष्मी जी की अराधना करें।

धनतेरस में घर लाएं इन शुभ चीजों में से कोई एक चीज, दूर होगी धन की कमी, समृद्धि का होगा वास

12-Nov-2020

धनतेरस को धन त्रयोदशी भी कहा जाता रहै। धनतरेस के दिन से ही दिवाली के त्योहार की शुरुआत होती है। इस साल यह त्योहार 13 नवंबर को मनाया जा रहा है। इस दिन धन के देवता कुबैर, माता लक्ष्मी की पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि माता लक्ष्मी इस दिन समुद्र मंथन के दौरान धन और सोने से भरा कलश लेकर प्रकट हुईं थी। यही नहीं इस दिन आयुर्वेद के जेवता धनवंतरी की पूजा भी की जाती है। इस दिन लोग अपने घर में औऱ बाहर दिया जलाते हैं। इस दिन लोग सोना-चांदी, धातु की चीजें आदि खरीदते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन शुभ मुहूर्त में खरीदी हुई चीजें अक्षय फल देते हैं। इस लोग अपने घरों और व्यापारिक स्थल में भी पूजा अर्चना करते हैं। आइए जानें धनतेरस के दिन मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए कुछ चीजें खरीदना बेहद जरूरी.

धनिया: मान्यता है कि धनतेरस के दिन धनिया खरीदकर लाना बेहद शुभकारी और लाभकारी माना जाता है. धनिया धन को बढ़ाता है. धनतेरस के दिन धनिया को लाकर मां लक्ष्मी को अर्पित कर पूजा करें. उसके बाद कुछ दानों को गमले में बो दें. अगर यह धनिया के पौधे निकलते है तो साल भर घर में सुख समृद्धि की वृद्धि होती है.

गोमती चक्र: धनतेरस के दिन पांच गोमती चक्र खरीदें. उसके बाद उसे मां लक्ष्मी को अर्पित करें. अगले दिन पूजा करने के बाद तिजोरी या गल्ले {पैसों का स्थान} में रख दें. कभी धन दौलत की कमी नहीं होगी.

लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां: दिवाली के दिन भगवान गणेश और लक्ष्मी की पूजा की जाती है. इसके लिए धनतेरस के दिन लक्ष्मी और गणेश की मूर्ति खरीद लेनी चाहिए. मूर्ति खरीदते समय यह ध्यान रखना बहुत जरुरी है कि, भगवान गणेश की सूंढ़ बाईं तरफ होनी चाहिए और लक्ष्मी जी कमल के पुष्प पर बैठी हुई हों और उनके हाथों से धन गिर रहा हो.

झाड़ू: झाड़ू को मां लक्ष्मी का रूप माना जाता है. मान्यता है कि धनतेरस के दिन झाड़ू लाने पर घर में मां लक्ष्मी का प्रवेश होता है. कहते हैं कि धनतेरस के दिन झाड़ू को लाना मां लक्ष्मी को घर लाने के समान है. धनतेरस पर खरीदे गए झाड़ू का प्रयोग दिवाली की पूजा के बाद अगले दिन से करें. पुरानी झाड़ू को दिवाली के अगले दिन घर से बाहर कर दें.

Dhanteras 2020: धनतेरस और दिवाली तक की तारीख को लेकर न हों कंफ्यूज, जानिए यहां सही तिथि

12-Nov-2020

इस वर्ष मलमास या अधिक मास का असर नवरात्रि से लेकर दीवाली की तिथि पर पड़ा है। त्योहारों के मुहूर्त को लेकर भी लोगों के बीच कन्फ्यूजन है। धनतेरस किस दिन है ये भी लोगों के लिए बड़ा सवाल बना हुआ है। इस बार धनतेरस दो दिन मनाया जाएगा, यानी 12 और 13 नवंबर।

कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है। इस साल धनतेरस 13 नवंबर को मनाया जाएगा। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक, त्रयोदशी 12 नवंबर की शाम से लग जाएगी। ऐसे में धनतेरस की खरीदारी 12 नवंबर को भी की जा सकेगी। हालांकि उदया तिथि में त्योहार मनाया जाता है। ऐसे में धनतेरस 13 नवंबर को मनाया जाएगा।

इस साल छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी 14 नवंबर को मनाई जाएगी। नरक चतुर्दशी पर स्नान का शुभ मुहूर्त सुबह 5:23 से सुबह 6:43 बजे तक रहेगा। चतुर्दशी तिथि 14 नवंबर को दोपहर 1 बजकर 16 मिनट तक ही रहेगी। इसके बाद अमावस्या लगने से दिवाली भी इसी दिन मनाई जाएगी।

15 नवंबर की सुबह 10.00 बजे तक ही अमावस्या तिथि रहेगी। अमावस्या तिथि में रात में भगवान गणेश और मां लक्ष्मी का पूजन किया जाता है। ऐसे में दिवाली भी इस साल 14 नवंबर को मनाई जाएगी।

इस बार करवा चौथ पर बन रहा है शुभ योग, सुहागिन महिलाओं को मिलेगा अखंड सौभाग्य

03-Nov-2020

करवा चौथ के दिन महिलाएं पति की लंबी आयु की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखती हैं। शाम को चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोलती हैं। इस साल करवा चौथ का व्रत 4 नवंबर (बुधवार) को रखा जाएगा। करवा चौथ व्रत सुहागिनों के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस व्रत में सास अपनी बहू को सरगी देती है और इस सरगी को खाने के बाद ही बहू अपने व्रत की शुरुआत करती है। करवा चौथ व्रत बिना चंद्र दर्शन के अधूरा माना जाता है। जानिए करवा चौथ व्रत में चंद्र दर्शन से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए-

1. करवा चौथ के दिन व्रती महिलाएं सुबह 4 बजे उठकर सरगी खाती हैं और दिन भर निर्जला व्रत रखती हैं। इसके बाद चंद्रोदय के समय पूजा की थाली सजाती हैं।

2. मान्यता है कि इस दिन व्रती महिलाएं सास या किसी बुजुर्ग का अनादर करती हैं तो उनके व्रत का फल नष्ट हो जाता है। 

3. कहते हैं कि इस दिन हलवे-पूरी का भोग लगाने के बाद इस प्रसाद को सास को आदरपूर्वक देना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

4. इस दिन विवाहित महिलाएं चांद देखने से पहले किसी को भी दूध, दही, चावल या सफेद कपड़ा न दें। कहते हैं कि ऐसा करने से चंद्रमा नाराज होते हैं और अशुभ फल देते हैं।

5. मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने वाली स्त्री को काले और सफेद कपड़े पहनने से बचना चाहिए। करवा चौथ व्रत में लाल या पीले रंग के वस्त्र पहनना फलदायी माना जाता है।

हिंदू धर्म के अनुसार, वैवाहिक जीवन में मंगलसूत्र का खास महत्व होता है। यह काले मोतियों की माला होती है, जिसे महिलाएं गले में पहनती हैं। मंगलसूत्र को शुभता का प्रतीक मानते हैं। माना जाता है कि मंगलसूत्र धारण करने से पति की रक्षा होती है और उसके जीवन के सारे दुख दूर हो जाते हैं। मंगलसूत्र महिलाओं के लिए भी रक्षा कवच और संपन्नता का प्रतीक माना गया है।

करवा चौथ पर बुध के साथ सूर्य ग्रह भी विद्यमान होंगे, जो बुधादित्य योग बना रहे हैं। इस दिन शिवयोग के साथ ही सर्वार्थसिद्धि, सप्तकीर्ति, महादीर्घायु और सौख्य योग 4 नवंबर को प्रातः 3:24 बजे से कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि सर्वार्थ सिद्धि योग एवं मृगशिरा नक्षत्र में चतुर्थी तिथि का समापन 5 नवंबर को प्रातः 5:14 बजे होगा।  4 नवंबर को शाम 5:34 बजे से शाम 6:52 बजे तक करवा चौथ की पूजा का शुभ मुहूर्त है

करवा चौथ के दिन मां पार्वती, भगवान शिव कार्तिकेय एवं गणेश सहित शिव परिवार का पूजन किया जाता है। मां पार्वती से सुहागिनें अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। इस दिन करवे में जल भरकर कथा सुनी जाती है। महिलाएं सुबह सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं और चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोलती हैं।

499 वर्ष बाद इस दिवाली पर बन रहा दुर्लभ योग, धन संबंधी कार्यों में मिलेगी बड़ी उपलब्धि

02-Nov-2020

नई दिल्ली,इंडिया।  14 नवंबर को इस वर्ष दीपावली मनाई जाएगी। दिवाली इस दिन शनिवार को पड़ रहा है। ऐसे में यह दिन तंत्र पूजा के लिए बेहद खास रहेगा। इस दिन गुरु ग्रह अपनी राशि धनु में और शनि अपनी राशि मकर में रहेगा। शुक्र ग्रह कन्या राशि में नीच का रहेगा। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार, करीब 499 वर्ष बाद दिवाली के दिन तीन बड़े ग्रहों का यह दुर्लभ योग बन रहा है। इससे पहले 1521 में यह योग बना था जो कि 499 वर्ष पहले था। उस वर्ष 9 नवंबर को दिवाली मनाई गई थी। कहा जाता है कि आर्थिक स्थिति को मजबूत करने वाला ग्रह गुरु और शनि है। ऐसे में इस वर्ष दीपावली पर धन संबंधी कार्यों में बड़ी उपलब्धि मिल सकती है क्योंकि ये दोनों ग्रह अपनी राशि में होंगे।

दरअसल, 14 नवंबर को देश भर में दीपावली में गुरु ग्रह अपनी राशि धनु में और शनि अपनी राशि मकर में रहेंगे। वहीं, शुक्र ग्रह कन्या राशि में नीच रहेगा। इन तीनों ग्रहों का यह दुर्लभ योग वर्ष 2020 से पहले सन 1521 में 9 नवंबर को देखने को मिला था। इसी दिन उस वर्ष दीपोत्सव मनाई गई थी। गुरु और शनि ग्रह आर्थिक स्थिति को मजबूत करने वाले माने जाते हैं।

चतुर्दशी और अमावस्या तिथि दोनों ही 14 नवंबर को: दिवाली के दिन यानी 14 नवंबर को चतुर्दशी तिथि दोपहर 1 बजकर 16 मिनट तक रहेगी। इसके बाद अमावस्या शुरू हो जाएगी। इस दिन यानी दिवाली के दिन लक्ष्मी पूजा की जाती है। यह पूजा संध्याकाल और रात में ही की जाती है। अमावस्या की बात करें तो यह तिथि 15 नवंबर को सुबह 10 बजकर 16 मिनट तक ही रहेगी। ऐसे में दिवाली को 14 नवंबर को ही मनाया जाना बेहतर है। 15 नवंबर को केवल स्नान-दान की अमावस्या मनाई जाएगी।

दीपावली का शुभ मुहूर्त : 14 नवंबर को चतुर्दशी तिथि पड़ रही है जो दोपहर 1:16 तक रहेगी। इसके बाद अमावस तिथि का आरंभ हो जाएगा जो 15 नवंबर की सुबह 10:00 बजे तक रहेगी। हालांकि, 15 तारीख को केवल स्नान दान की अमावस्या की जाएगी। गौरतलब है कि लक्ष्मी पूजा संध्याकाल या रात्रि में दिवाली में की जाती है।

दिवाली से एक दिन पहले धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है। हिंदू धर्म में धनतेरस पर नए सामान खरीदना शुभ माना जाता है। आपके लिए खरीदारी का शुभ मुहूर्त 6 बजकर 1 मिनट से शुरू होकर 8 बजकर 33 मिनट पर खत्म रहेगा। दिवाली में मां लक्ष्मी के साथ-साथ श्री यंत्र की पूजा की जाती है। ज्योतिष विशेषज्ञों की मानें तो इस दीपावली गुरु धनु राशि में रहेगी ऐसे में श्री यंत्र की पूजा रात भर कच्चे दूध से करना लाभदायक हो सकता है।

Sharad Purnima 2020: हर रोग का नाश करती है शरद पूर्णिमा! जानें शुभ मुहूर्त और महत्व

28-Oct-2020

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ 30 अक्टूबर को शाम 05 बजकर 45 मिनट से हो रहा है, जो अगले दिन 31 अक्टूबर को रात 08 बजकर 18 मिनट तक रहेगा। शरद पूर्णिमा 30 अक्टूबर को होगी। शरद पूर्णिमा आश्विन मास में आती है, इसलिए इसे आश्विन पूर्णिमा भी कहते हैं।

हिन्दी पंचांग के अनुसार, शरद पूर्णिमा हर वर्ष आश्विन मास में आती है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को शरद पूर्णिमा या आश्विन पूर्णिमा कहते हैं। इस वर्ष शरद पूर्णिमा या आश्विन पूर्णिमा 30 अक्टूबर दिन शुक्रवार को है। शरद पूर्णिमा का एक विशेष धार्मिक महत्व होता है। इस दिन धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा या कोजागरी लक्ष्मी पूजा के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पू​र्णिमा के दिन ही माता लक्ष्मी की अवतरण हुआ था।

ज्योतिष के मुताबिक वर्ष में एक बार शरद पूर्णिमा के दिन ही चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। ऐसी मान्यता है कि शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की किरणों से अमृत की बूंदें बरसती हैं, जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती हैं। पूर्णिमा की चांदनी में खीर बनाकर खुले आसमान में रखते हैं, ताकि चंद्रमा की अमृत युक्त किरणें इसमें आएंगी और खीर औषधीय गुणों से युक्त होकर अमृत के समान हो जाएगा। उसका सेवन करना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होगा। शरद पूर्णिमा का महत्व लक्ष्मी पूजा के लिए भी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा को माता लक्ष्मी रातभर विचरण करती हैं। जो लोग माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं और अपने घर में उनको आमंत्रित करते हैं, उनके यहां वर्ष भर धन वैभव की कोई कमी नहीं रहती है।

शरद पूर्णिमा व्रत विधि:

  • शरद पूर्णिमा के दिन सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाएं और नित्यकर्मों से निवृत्त होकर स्नानादि कर लें। फिर घर के मंदिर को साफ करें।
  • मां लक्ष्मी का ध्यान करें और फिर देवी लक्ष्मी और श्रीहरि की पूजा करें।
  • एक साफ चौकी लें और उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। इस पर मां लक्ष्मी और विष्णु जी की मूर्ति स्थापित करें।
  • भगवान की मूर्ति या प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाएं। धूप लगाएं। मूर्ति पर गंगाजल छिड़के और अक्षत् और रोली का तिलक लगाएं।
  • फिर सफेद या पीले रंग की मिठाई से भोग लगाएं। साथ ही लाल या पीले रंग के फूल चढ़ाएं। अगर आप गुलाब का फूल चढ़ाते हैं तो बेहतर होगा।
  • गाय के दूध में चावल की खीर बनाएं। इसके बाद इस खीर को छोटे-छोटे बर्तनों में भरें और चंद्रमा की रोशनी में छलनी से ढककर रख दें।
  • इसके बाद ब्रह्म मुहूर्त जागते हुए गणपति की आरती के बाद विष्णु सहस्त्रनाम का जप, श्रीसूक्त का पाठ, भगवान श्रीकृष्ण की महिमा, श्रीकृष्ण मधुराष्टकम् का पाठ और कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें।
  • फिर अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाएं और स्नानादि कर लें। फिर मां लक्ष्मी को खीर अर्पित करें। यह खीर प्रसाद के रूप में घर-परिवार के लोगों को दें।

Navratri 2020: आज मां शैलपुत्री के पूजन के साथ होगी नवरात्रि की घटस्थापना, जानें घट स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

17-Oct-2020

Navratri 2020:- नवरात्रि शरद ऋतु में अश्विन शुक्ल पक्ष से शुरू होती हैं और पूरे नौ दिनों तक चलती हैं। इस बार शारदीय नवरात्रि 17 अक्टूबर यानी आज से शुरू होकर 25 अक्टूबर तक है। 26 अक्टूबर को विजयदशमी या दशहरा मनाया जाएगा। नवरात्रि से जुड़े कई रीति-रिवाजों के साथ कलश स्थापना का विशेष महत्व है। कलश स्थापनाको घट स्थापना भी कहा जाता है। नवरात्रि की शुरुआत घट स्थापना के साथ ही होती है। घट स्थापना शक्ति की देवी का आह्वान है।

ऐसे करें घट स्थापना ( Kalash Sthapana)

  • चौकी पर लाल आसन बिछाकर देवी भगवती को प्रतिष्ठापित करें

  • ईशान कोण में घटस्थापना करें

  • कलश में गंगाजल, दो लोंग के जोड़े, सरसो, काले तिल, हल्दी, सुपारी रखें

  • कलश में जल पूरा रखें, सामर्थ अनुसार चांदी का सिक्का या एक रुपये का सिक्का रखें

  • कलश के चारों ओर पांच, सात या नौ आम के पत्ते रख लें

  • जटा नारियल पर लाल चुनरी बांध कर नौ बार कलावा बांध दें। ( गांठ न लगाएं)

( नारियल को पीले चावल हाथ में रखकर संकल्प करें और फिर नारियल कलश पर स्थापित कर दें। कलश का स्थान न बदलें। प्रतिदिन कलश की पूजा करें)

  • कलश स्थापना से पहले गुरु, अग्रणी देव गणेश, शंकरजी, विष्णुजी, सर्वदेवी और नवग्रह का आह्वान करें।

  • जिस मंत्र का जाप संकल्प लें, उसी का वाचन करते हुए कलश स्थापित करें

घट स्थापना का मुहूर्त ( शनिवार)

शुभ समय - सुबह 6:27 से 10:13 तक ( विद्यार्थियों के लिए अतिशुभ)

अभिजीत मुहूर्त - दोपहर 11:44 से 12:29 तक ( सर्वजन)

स्थिर लग्न ( वृश्चिक)- प्रात: 8.45 से 11 बजे तक ( शुभ चौघड़िया, व्यापारियों के लिए श्रेष्ठ)

किस राशि के लिए शुभ

सभी राशियों के लिए शुभ। मेष और वृश्चिक के लिए विशेष फलदायी।

आज का शुभ रंग : लाल

मां शैलपुत्री को लाल रंग बहुत प्रिय है। उन्हें लाल रंग की चुनरी, नारियल और मीठा पान भेंट करें।

किस रंग के कपड़े पहनें

भक्त पूजा के समय लाल और गुलाबी रंग के वस्त्र धारण करें।

आज के दिन का महत्व

नवदुर्गाओं में शैलपुत्री का सर्वाधिक महत्व है। पर्वतराज हिमालय के घर मां भगवती अवतरित हुईं, इसीलिए उनका नाम शैलपुत्री पड़ा। अगर जातक शैलपुत्री का ही पूजन करते हैं तो उन्हें नौ देवियों की कृपा प्राप्त होती है।

जानिए, पितरों के पिण्डदान में काला तिल और कुश का क्या है महत्व ?

11-Sep-2020

नई दिल्ली,इंडिया। पितरों को तृप्त करने तथा देवताओं और ऋषियों को काले तिल, अक्षत मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहा जाता है। तर्पण में काला तिल और कुश का बहुत महत्व होता है। पितरों के तर्पण में तिल, चावल, जौ आदि को अधिक महत्त्व दिया जाता है। श्राद्ध में तिल और कुशा का सर्वाधिक महत्त्व होता है। श्राद्ध करने वालों को पितृकर्म में काले तिल के साथ कुशा का उपयोग महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि तर्पण के दौरान काले तिल से पिंडदान करने से मृतक को बैकुंठ की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि तिल भगवान के पसीने से और कुशा रोम से उत्पन्न है इसलिए श्राद्ध कार्य में इसका होना बहुत जरूरी होता है।

Pitra Paksha 2020: पितृ पक्ष का महत्व, पितृ पक्ष से जुड़ी कर्ण और इंद्र की कथा

05-Sep-2020

नई दिल्ली,इंडिया। अभी पितृ पक्ष चल रहा है। पितरों का ये पक्ष 17 सितंबर तक चलेगा। पितृ पक्ष के संबंध में महाभारत में भी उल्लेख है। पौराणिक धर्मग्रंथों के अनुसार सनातन धर्म में ब्रह्मयज्ञ (स्वाध्याय), पितृयज्ञ (पिंडक्रिया), देवयज्ञ (होम आदि), भूतयज्ञ (बलिवैश्वदेव) और मनुष्ययज्ञ (अतिथि सत्कार) इन्हीं पांच यज्ञों को करने का विधान है जिसके करने से प्राणियों की समस्त बाधाएं और दुखों का निवारण हो जाता है पृथ्वी पर उसके लिए कुछ करना शेष नहीं रहता। मनुष्य जन्म लेने के साथ ही जिन तीन ऋणों की चादर में लिपटा रहता है उनमें 'पितृऋण' प्रमुख है जिससे मुक्ति पाने का सर्वोतम मार्ग गया अथवा बद्रीनाथ में श्राद्ध-पिंडदान करना है।

पितृ पक्ष में मृत पूर्वजों को श्रद्धा से याद करना ही श्राद्ध कहलाता है। पिंडदान करने का मतलब ये है कि हम पितरों के लिए भोजन दान कर रहे हैं। तर्पण करने का अर्थ यह है कि हम जल का दान कर रहे हैं। इस तरह पितृ पक्ष में इन तीनों कामों का महत्व है।

पितृ पक्ष में पितरों के साथ ही अग्निदेव भी अन्न ग्रहण करते हैं। इस संबंध में मान्यता है कि अग्निदेव के साथ भोजन करने पर पितर देवता जल्दी तृप्त हो जाते हैं। इसीलिए पितृ पक्ष में धूप-ध्यान करते समय जलते हुए कंडे पर ही पितरों के लिए भोजन अर्पित किया जाता है।

पितृ पक्ष से जुड़ी कर्ण और इंद्र की कथा :

पितृ पक्ष से जुड़ी कर्ण की भी एक कथा प्रचलित है। कर्ण की मृत्यु के बाद उनकी आत्मा स्वर्ग पहुंची तो आत्मा को खाने के लिए बहुत सारा सोना और गहने दिए गए। कर्ण की आत्मा ने देवराज इंद्र से पूछा कि उन्हें भोजन में सोना क्यों दिया जा रहा है?

इंद्रदेव ने कर्ण से कहा कि तुमने जीवनभर सिर्फ सोना ही दान दिया है। कभी भी अपने पूर्वजों को खाना दान नहीं किया। इसके बाद कर्ण को पितृ पक्ष के 16 दिनों में धरती पर वापस भेजा गया, जहां उन्होंने अपने पूर्वजों को याद करते हुए पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण किया।

Pitra Paksha 2020: पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर है पितृ-पक्ष, जानें- क्या है महत्व, पितृदोष के जातक करें ये काम

02-Sep-2020

नई दिल्ली,इंडिया। श्राद्ध का अर्थ श्रद्धा से है, जो धर्म का आधार है। माता पार्वती और शिव को ‘श्रद्धा विश्वास रूपिणौ’ कहा गया है। पितृ-पक्ष हमें अपने पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि मानव शरीर तीन स्तरों वाला है। ऊपर से दृश्यमान देह स्थूल शरीर है। इसके अंदर सूक्ष्म शरीर है, जिसमें पांच कर्मेंद्रियां, पांच ज्ञानेंद्रियां, पंच प्राण (प्राण, अपान, व्यान, उदान समान), पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, वायु) के अपंचीकृत रूप, अंत:करण चतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार), अविद्या, काम और कर्म होते हैं। इसी के अंदर कारण शरीर होता है, जिसमें सत, रज, तम तीन गुण होते हैं। यहीं आत्मा विद्यमान है। मृत्यु होने पर सूक्ष्म और कारण शरीर को लेकर आत्मा स्थूल शरीर को त्याग देता है। मान्यता है कि यह शरीर वायवीय या इच्छामय है और मोक्ष पर्यंत शरीर बदलता रहता है। दो जन्मों के बीच में जीव इसी रूप में अपनी पूर्ववर्ती देह के अनुरूप पहचाना जाता है। मरणोपरांत जीव कर्मानुसार कभी तत्काल पुनर्जन्म, कभी एक निश्चित काल तक स्वर्गादि उच्च या नरकादि निम्न लोकों में सुख-दुख भोग कर पुन: जन्म लेता है। अधिक अतृप्त जीव प्रबल इच्छाशक्ति के चलते यदाकदा स्थूलत: अपने अस्तित्व का आभास करा देते हैं। उचित समय बीतने पर ये पितृ लोक में निवास करते हैं। ‘तैतरीय ब्राह्मण’ ग्रंथ के अनुसार, भूलोक और अंतरिक्ष के ऊपर पितृ लोक की स्थिति है।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, देव, पितृ, प्रेत आदि सभी सूक्ष्म देहधारी भोग योनि में हैं, कर्मयोनि में नहीं। उनमें आशीर्वाद, वरदान देने की असीम क्षमता है, किंतु स्वयं की तृप्ति के लिए वे स्थूल देह धारियों के अर्पण पर निर्भर हैं। महाभारत में पितरों को ‘देवतानां च देवता’ कहा गया है, क्योंकि देव तो सबके होते हैं, पितृ अपने वंशजों के हित साधक। पितरों को संतुष्ट करने के लिए श्राद्ध यानी पिंडदान व तर्पण आवश्यक माना गया है।

कैसे करें श्राद्ध: महाराज ने बताया कि हो सके तो प्रतिदिन अथवा पितरों की पुण्यतिथि पर श्राद्ध कर्ता को पवित्र भाव से दक्षिणाभिमुख होकर यज्ञोपवीत को अपसब्य करें। दोनों हाथ की अनामिका उंगली में पवित्री धारण करके जल में चावल, जौ, दूध, चंदन, तिल मिलाकर पूर्वजों का विधिवत तर्पण करना चाहिए। इस क्रिया से पूर्वजों को परम शांति मिलती है। तर्पण के बाद पूर्वजों के निमित्त पिंड दान करना चाहिए। पिंडदान के उपरांत गाय, ब्राह्मण, कौआ, चींटी या कुत्ता को भोजन कराना चाहिए। इस क्रिया को हम पंच बलि के नाम से जानते हैं।


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