हेरा पंचमी पर श्री महालक्ष्मी की दो डोलियां पहुंचीं गुडि़चा मंदिर सिरहासार
हेरा पंचमी पर श्री महालक्ष्मी की दो डोलियां पहुंचीं गुडि़चा मंदिर सिरहासार
छत्तीसगढ़ संवाददाता
जगदलपुर, 20 जुलाई। बस्तर गोंचा महापर्व के अंतर्गत आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर परंपरानुसार हेरा पंचमी पूजा विधान संपन्न हुई। इस अवसर पर श्रीश्री महालक्ष्मी जी की दो भव्य डोलियां नगर भ्रमण एवं रथ परिक्रमा स्थल से होते हुए गुडि़चा मंदिर (सिरहासार भवन) पहुँचीं, जहाँ भगवान श्री जगन्नाथ जी के साथ पारंपरिक लक्ष्मी-नारायण संवाद का आयोजन किया गया। पूजा-विधान एवं संवाद के उपरांत दोनों डोलियां पुन: श्री जगन्नाथ मंदिर लौट आईं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्री जगन्नाथ, भगवान बलभद्र एवं माता सुभद्रा रथयात्रा के दौरान गुडि़चा मंदिर (मौसी घर) में चार दिनों तक विराजमान रहते हैं। इस दौरान श्री मंदिर वापस नहीं लौटने पर श्रीश्री महालक्ष्मी जी भगवान श्री जगन्नाथ की खोज में निकलती हैं। गुडि़चा मंदिर पहुँचने पर भगवान श्री जगन्नाथ से उनकी नाराजगी एवं संवाद की परंपरा को लक्ष्मी-नारायण संवाद कहा जाता है, जिसे हेरा पंचमी के रूप में मनाया जाता है।
बस्तर की परंपरा के अनुसार श्री जगन्नाथ मंदिर से दो डोलियां निकाली जाती हैं। पहली डोली राजपरिवार, राजगुरु एवं कुँवर परिवार के निवास पर दर्शन एवं पूजन के पश्चात मंदिर के मुख्य द्वार पहुँचती है। इसके बाद दूसरी डोली मंदिर से निकलती है। दोनों डोलियां एक साथ रथ परिक्रमा मार्ग से होकर गुडि़चा मंदिर सिरहासार पहुँचती हैं, जहाँ विधि-विधानपूर्वक लक्ष्मी-नारायण संवाद संपन्न कराया जाता है।
हेरा पंचमी का यह पूजा-विधान भगवान श्री जगन्नाथ के प्रति श्री महालक्ष्मी जी के स्नेह, समर्पण एवं दांपत्य भाव का प्रतीक माना जाता है। बस्तर में यह प्राचीन धार्मिक परंपरा पिछले 619 वर्षों से निरंतर श्रद्धा, आस्था और परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ निभाई जा रही है।
छत्तीसगढ़ संवाददाता
जगदलपुर, 20 जुलाई। बस्तर गोंचा महापर्व के अंतर्गत आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर परंपरानुसार हेरा पंचमी पूजा विधान संपन्न हुई। इस अवसर पर श्रीश्री महालक्ष्मी जी की दो भव्य डोलियां नगर भ्रमण एवं रथ परिक्रमा स्थल से होते हुए गुडि़चा मंदिर (सिरहासार भवन) पहुँचीं, जहाँ भगवान श्री जगन्नाथ जी के साथ पारंपरिक लक्ष्मी-नारायण संवाद का आयोजन किया गया। पूजा-विधान एवं संवाद के उपरांत दोनों डोलियां पुन: श्री जगन्नाथ मंदिर लौट आईं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्री जगन्नाथ, भगवान बलभद्र एवं माता सुभद्रा रथयात्रा के दौरान गुडि़चा मंदिर (मौसी घर) में चार दिनों तक विराजमान रहते हैं। इस दौरान श्री मंदिर वापस नहीं लौटने पर श्रीश्री महालक्ष्मी जी भगवान श्री जगन्नाथ की खोज में निकलती हैं। गुडि़चा मंदिर पहुँचने पर भगवान श्री जगन्नाथ से उनकी नाराजगी एवं संवाद की परंपरा को लक्ष्मी-नारायण संवाद कहा जाता है, जिसे हेरा पंचमी के रूप में मनाया जाता है।
बस्तर की परंपरा के अनुसार श्री जगन्नाथ मंदिर से दो डोलियां निकाली जाती हैं। पहली डोली राजपरिवार, राजगुरु एवं कुँवर परिवार के निवास पर दर्शन एवं पूजन के पश्चात मंदिर के मुख्य द्वार पहुँचती है। इसके बाद दूसरी डोली मंदिर से निकलती है। दोनों डोलियां एक साथ रथ परिक्रमा मार्ग से होकर गुडि़चा मंदिर सिरहासार पहुँचती हैं, जहाँ विधि-विधानपूर्वक लक्ष्मी-नारायण संवाद संपन्न कराया जाता है।
हेरा पंचमी का यह पूजा-विधान भगवान श्री जगन्नाथ के प्रति श्री महालक्ष्मी जी के स्नेह, समर्पण एवं दांपत्य भाव का प्रतीक माना जाता है। बस्तर में यह प्राचीन धार्मिक परंपरा पिछले 619 वर्षों से निरंतर श्रद्धा, आस्था और परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ निभाई जा रही है।